रिपोर्ट - दिलीप सिंह
डॉक्टर और तहसीलदार की रिपोर्ट में लेखपाल को क्लीनचिट देने का आरोप, संगठन ने निष्पक्ष जांच की उठाई मांग
गोंडा। वरिष्ठ पत्रकार सुलेमान की मौत के मामले में डॉक्टर और तहसीलदार की ओर से भेजी गई रिपोर्ट पर सवाल उठने लगे हैं। पत्रकार संगठन ने रिपोर्ट को घोल-मोल बताते हुए पूरे प्रकरण की मजिस्ट्रेटी जांच कराने की मांग की है। संगठन का आरोप है कि रिपोर्ट में तथ्यों को स्वीकार करने के बावजूद प्रभारी लेखपाल को जिम्मेदारी से मुक्त करने का प्रयास किया गया है।
बताया गया कि वरिष्ठ पत्रकार सुलेमान की 15 सितंबर को मौत हुई थी। मौत से पहले जारी किए गए वीडियो में उन्होंने अपनी परेशानी और इलाज के लिए आर्थिक सहायता से जुड़े मामले में लेखपाल की भूमिका का जिक्र किया था। वीडियो में सुलेमान ने बताया था कि राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टरों ने दो तार वाले ड्यूल पेसमेकर के लिए करीब साढ़े सात लाख रुपये का खर्च बताया था।
सुलेमान के अनुसार, मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से आर्थिक सहायता के लिए विधायक के पत्र के आधार पर तत्कालीन लेखपाल प्रवीण शुक्ला ने उन्हें पात्र बताते हुए संस्तुति की थी। इसके बाद करीब दो लाख रुपये की सहायता की प्रक्रिया हुई। ऑपरेशन का खर्च अधिक होने के कारण उन्होंने दोबारा विधायक से करीब पांच लाख रुपये की सहायता के लिए पत्र लिखवाया। आरोप है कि इस बार प्रभारी लेखपाल आरके मिश्रा ने उन्हें अपात्र बताते हुए रिपोर्ट भेज दी, जिसके कारण राहत कोष से सहायता नहीं मिल सकी।
मामले में तैयार रिपोर्ट में डॉक्टर और तहसीलदार ने दोनों रिपोर्टों का उल्लेख किया है। रिपोर्ट में दो अन्य मामलों का उदाहरण भी दिया गया है, जिनमें आयुष्मान कार्ड धारकों को मुख्यमंत्री राहत कोष से अनुदान के लिए पात्र बताया गया था, लेकिन शासन स्तर से उनके आवेदन अस्वीकृत कर दिए गए।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि दो तार वाले ड्यूल पेसमेकर के ऑपरेशन के संबंध में कोई स्पष्ट शासनादेश नहीं मिला। इंटरनेट पर जानकारी देखने के बाद रिपोर्ट में कहा गया कि आयुष्मान योजना के तहत पांच लाख रुपये तक का इलाज संभव है और इससे अधिक खर्च होने पर मुख्यमंत्री राहत कोष से सहायता मिलने की संभावना हो सकती है। साथ ही, सुलेमान के परिजनों द्वारा मौखिक रूप से डॉक्टर की ओर से ऑपरेशन का खर्च साढ़े सात लाख रुपये बताए जाने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज की गई है।
इसके बावजूद रिपोर्ट के निष्कर्ष में प्रभारी लेखपाल की ओर से कोई त्रुटि नहीं किए जाने की बात कही गई है। इसी बिंदु को लेकर पत्रकार संगठन ने आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि जब रिपोर्ट में पूर्व की पात्रता संबंधी संस्तुति और बाद में अपात्र घोषित किए जाने दोनों तथ्यों का उल्लेख है, तो लेखपाल की भूमिका को पूरी तरह सही ठहराने का आधार स्पष्ट नहीं किया गया है।
संगठन ने आरोप लगाया कि रिपोर्ट में महत्वपूर्ण तथ्यों को स्वीकार करने के बावजूद निष्कर्ष में लेखपाल को क्लीनचिट देने का प्रयास किया गया है। संगठन ने मामले की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए लेखपाल के साथ-साथ संबंधित डॉक्टर और तहसीलदार की भूमिका की भी मजिस्ट्रेटी जांच कराने की मांग की है। संगठन का कहना है कि जांच में सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिका, दोनों रिपोर्टों के आधार और सहायता आवेदन के निस्तारण की पूरी प्रक्रिया को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

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