स्वच्छता की ब्रांड एंबेसडर मनोरानी देवी की हृदय गति रुकने से मौत, क्षेत्र में शोक की लहर

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रिपोर्ट- मिथिलेश जायसवाल 

बहराइच :-  कतर्नियाघाट वन्य जीव प्रभाग क्षेत्र के घने जंगलों के बीच बसे गांव में रहने वाली एक महिला ने जहां सामुदायिक शौचालय निर्माण के लिए अपनी जमीन दान दी वहीं एक संस्था द्वारा उन्हें स्वच्छता का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था जिससे उस महिला की पूरे देश में चर्चा हुई थी लेकिन मंगलवार को हृदयगति रुक जाने से उनकी मौत हो गई जिससे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।भारत के ग्रामीण स्वच्छता आंदोलन को अपनी दूरदर्शिता से एक नई दिशा देने वाली और सुप्रसिद्ध संस्था सुलभ इंटरनेशनल की ब्रांड एंबेसडर मनोरानी देवी का मंगलवार, 2 जून 2026 की सुबह करीब 10:00 बजे दिल का दौरा पड़ने (हृदय गति रुकने) से आकस्मिक निधन हो गया। वह 51 वर्ष की थीं। उन्होंने कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग के घने जंगलों के बीच बसे अपने निवास स्थान ग्राम भवानीपुर में अंतिम सांस ली।

परिजनों के अनुसार, मंगलवार की सुबह वह रोज की तरह अपने घरेलू कार्यों में व्यस्त थीं, तभी अचानक उनके सीने में तेज दर्द हुआ और जब तक उन्हें चिकित्सीय सहायता मिल पाती, उनका प्राणांत हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही बहराइच सहित पूरे प्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वच्छता प्रेमियों और वन निवासियों में शोक की लहर दौड़ गई है।

वर्ष 1975 में जनपद बहराइच के विकासखंड शिवपुर तहसील नानपारा के अंतर्गत आने वाले ग्राम भया पुरवा में जन्मी मनोरानी देवी का शुरुआती जीवन बेहद कड़े संघर्षों के बीच बीता। परिवार में तीन भाई और चार बहनें होने के कारण आर्थिक तंगहाली के चलते उनकी पढ़ाई-लिखाई नहीं हो सकी। कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ उन पर आ गया और महज 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह कतर्नियाघाट जंगलों के बीच स्थित सुदूर आदिवासी बहुल गांव भवानीपुर में चुन्नी लाल यादव के साथ कर दिया गया।

नियति की क्रूरता यहीं समाप्त नहीं हुई। वर्ष 2004 में उनके पति की एक गंभीर बीमारी के कारण अकाल मृत्यु हो गई। पति के जाने के बाद दो बेटों और छह बेटियों (कुल आठ बच्चों) के पालन-पोषण और भरण-पोषण की पूरी जिम्मेदारी अकेले मनोरनी देवी के कंधों पर आ गई, जिसे उन्होंने मजदूरी और कड़े संघर्ष के बल पर निभाया।

मनोरानी देवी के जीवन और भवानीपुर के इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ वर्ष 2014 में आया। उस समय क्षेत्र में सक्रिय वन अधिकार आंदोलन की मांग पर बहराइच की तत्कालीन संवेदनशील जिलाधिकारी श्रीमती किंजल सिंह ने भवानीपुर गांव में एक सामुदायिक शौचालय निर्माण की स्वीकृति दी थी।

शौचालय निर्माण के लिए जब गांव में जमीन की तलाश शुरू हुई, तो रूढ़िवादिता और जागरूकता की कमी के कारण ग्रामीणों ने यह कहकर विरोध कर दिया कि "गांव के भीतर शौचालय बनने से गंदगी फैलेगी।" अधिकांश ग्रामीण चाहते थे कि शौचालय को गांव की आबादी से कहीं दूर घने जंगलों में बना दिया जाए, जिससे महिलाओं की सुरक्षा का संकट और बढ़ने का खतरा था।

इस गतिरोध को तोड़ने के लिए गांव में एक आपात बैठक बुलाई गई। उस ऐतिहासिक बैठक में विपरीत परिस्थितियों से जूझ रही एक साधारण वनवासी महिला मनोरानी देवी ने उठकर निर्भीकता से कहा-"शौचालय किसी गंदगी का घर नहीं, बल्कि हमारी बहू-बेटियों की इज्जत और सुरक्षा का सवाल है। अगर गांव में कोई जमीन नहीं दे रहा है, तो मेरे पास जो थोड़ी सी जमीन है, उसे मैं इस काम के लिए दान करती हूं। शौचालय गांव के बीच में ही बनेगा ताकि महिलाओं को भटकना न पड़े।"

मनोरानी देवी के इस साहसिक और क्रांतिकारी कदम की जानकारी जब क्षेत्र के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता जंग हिंदुस्तानी को हुई, तो उन्होंने इस प्रेरक वृत्तांत से तत्कालीन जिलाधिकारी श्रीमती किंजल सिंह को अवगत कराया। जिलाधिकारी के प्रयासों से यह प्रेरक कहानी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आ गई।

स्वच्छता के क्षेत्र में विश्व स्तर पर अलख जगाने वाले "सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक" तक जब यह खबर पहुंची, तो उन्होंने इस पर त्वरित संज्ञान लिया। सुलभ इंटरनेशनल द्वारा राजधानी लखनऊ में एक भव्य राज्य स्तरीय समारोह आयोजित किया गया, जहां डॉ. पाठक ने मनोरानी देवी के इस अद्वितीय त्याग को सलाम करते हुए उन्हें "सुलभ इंटरनेशनल का ब्रांड एंबेसडर" घोषित किया। साथ ही संस्था की ओर से उनके परिवार को संबल प्रदान करने के लिए दो लाख रुपये की सम्मान राशि का चेक भी प्रदान किया गया।

ब्रांड एंबेसडर बनने के बाद मनोरानी देवी का हौसला और बढ़ गया। उन्होंने न केवल अपने गांव भवानीपुर बल्कि कतरनियाघाट के दर्जनों वन गांवों  और थारू बाहुल्य बस्तियों में घूम-घूमकर महिलाओं को स्वच्छता, मासिक धर्म स्वच्छता और बंद शौचालयों के प्रयोग के प्रति जागरूक करना शुरू किया। वह अपने जीवन के अंतिम दिनों तक ग्रामीण महिलाओं के अधिकारों और स्वच्छता अभियान से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं।

उनके आकस्मिक निधन की सूचना मिलते ही उनके भवानीपुर स्थित आवास पर ढांढस बंधाने वालों का तांता लग गया। मनोरानी देवी के इस संघर्ष को दुनिया के सामने लाने वाले वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता जंग हिंदुस्तानी ने उनके निवास पर पहुंचकर पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

जंग हिंदुस्तानी ने दुख व्यक्त करते हुए कहा-"मनोरानी देवी जी का जाना ग्रामीण भारत के स्वच्छता आंदोलन के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने जिस दौर में घने जंगलों के बीच बैठकर महिला सम्मान की बात की और अपनी जमीन दान दी, वह कोई साधारण महिला नहीं बल्कि एक युगांतरकारी सोच की धनी थीं। कतरनिया का यह अंचल और देश के स्वच्छता प्रेमी उन्हें हमेशा याद रखेंगे।"

क्षेत्र के अन्य सामाजिक संगठनों, जन प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने भी उनके निधन को एक युग का अंत बताया है।

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