सनातन परम्परा में चारों वर्ण एक समान थे, खत्म होना चाहिए जाति आरक्षण – स्वामी रामभद्राचार्य

 


बिजेथुआ महोत्सव में नौ दिवसीय वाल्मीकि रामायण कथा का हुआ समापन

रिपोर्ट - पंकज गुप्ता 

सूरापुर (सुलतानपुर)।

“सनातन परम्परा में चारों वर्ण एक समान थे, किसी को ओबीसी या एससी नहीं कहा जाता था। सरकार यदि जाति आधारित आरक्षण खत्म कर आर्थिक आधार पर आरक्षण दे दे तो जाति व्यवस्था स्वतः समाप्त हो जाएगी।”

यह बात चित्रकूट तुलसी पीठाधीश्वर, पद्मविभूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित संत श्री स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज ने विजेथुआ महोत्सव के नौवें दिन वाल्मीकि रामायण कथा के समापन अवसर पर कही।स्वामी जी ने कहा कि “केवल नारे लगाने से हिंदू राष्ट्र नहीं बनेगा, इसके लिए आवश्यक है कि संसद में कम से कम 470 सीटें हिंदूवादियों की हों।”

उन्होंने कहा कि आतंकवादी की कोई जाति नहीं होती। प्राचीन भारत की अठारह स्मृतियां सनातन परम्परा का संविधान थीं, जिनमें समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं।

उन्होंने न्याय व्यवस्था पर कहा कि “दुष्कर्म करने वालों को कठोरतम दंड, यहाँ तक कि प्राणदंड मिलना चाहिए।”उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब संसद में प्रस्ताव पास कर रामचरितमानस को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाएगा।कथा के समापन अवसर पर आयोजक विवेक तिवारी ने सपत्नीक व्यासपीठ पूजन किया।तुलसी पीठ के उत्तराधिकारी रामचंद्र दास ने गुरु अर्चन किया।इस दौरान राज्य सूचना आयुक्त वीरेंद्र सिंह वत्स ने भी मंच साझा किया।उन्होंने कहा — “विजेथुआ धाम के विकास के लिए जितना संभव हुआ, मैंने प्रयास किया है। आगे भी महावीर बजरंग बली की कृपा से सेवा का अवसर मिलता रहेगा।”वत्स ने नई पीढ़ी से कहा कि “भक्ति, त्याग, सेवा, संघर्ष और समर्पण का मार्ग अपनाएं यही सफलता का सूत्र है।”कथा में न्यायाधीश इंद्रजीत, राष्ट्र संत शांतनु महाराज, आरएसएस के सह विभाग संघचालक हृदयराम यादव, ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि, डॉ. सुरेन्द्र प्रताप तिवारी, राम विनय सिंह और अमरीश मिश्र सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।

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