सुबह उठा तो मैंने देखा शीतल मंद हवाओं को,

 आज बहुत दिनों के बाद था देखा बदलते इन पछूवाओ को..... 1

 वीरान वीरान सा लगता है क्यों, हर गली हर पेड़ों की परछाई,

 ऐसा लगता है जैसे ढूंढ के उदासी मेरे घर आई,

 कौन है अंदर गुफ्तगू कर रहा  हवाओं ने आवाज लगाई अंदर से मैंने बोला,

मैं और मेरी तन्हाई............. 1

 आंखों में चंद अश्क थे कुछ धुंधली धुंधली सी परछाई.

कुछ बोलने को दिल चाहा,

पर आवाज नहीं निकल पाई.

 आंखों के सामने झूम पड़ा ओ मस्त बाजार बहारों का 

ओ चिकनी चुपड़ी बातें और मस्ती अपने यारों का,

 जो कहते थे कैसे चुकाऊंगा एहसान तेरे उपकारों का,

उनके पास वक्त नहीं है जवाब दे मेरे सवालों का.

 चंद लोग तो ऐसे थे जिनके जीवन का मैं हिस्सा था,

 अब समझ में आता है सब कुछ बहकावे का किस्सा था.

 उमर ढल गया, शौक ख़त्म हो गया,

चेहरे पर झुर्रियां झाई,

 फिर से बात करने बैठ गए

 मैं और मेरी तन्हाई............ 2

 अंतरद्वन्द में ही कैद हुए, चहर दिवारी के अंदर,

 कल तक जो विचरण करता था अविचलित होकर सिकंदर..

 सुबह हो गई दोपहर हुई,

न जाने कब शाम भी आई

 फिर बैठ गए बात करने

 मै और मेरी तन्हाई........ 3


शरद श्रीवास्तव "राही "