थरवई/ प्रयागराज :-- हम सबके लाइफ मे कैरियर बनाना एक बहुत ही बड़ी और जरूरी बात होती है । लेकिन यह करियर सिर्फ मेहनत , पढ़ाई और लगन से नही होता असल मे इसके साथ का अवरोध भी कैरियर बनाने वालो को पीछे छोड़ देता है । आज का मेरा यह पहला आर्टिकल इसी बात पर है, मैं भी अपने मनोभाव को यहां रखना चाहती हूं।
पिछले कुछ वर्षो मे सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वालो ने कठिनाई का सामना किया है, और आज भी कर रहे है , पता नही कब तक करेंगे । खैर वो जीवन ही क्या जिसमे बाधा न हो ,पर इसका मतलब गलत नही कह सकते हैं जब हम उन बाधाओं से बाहर आने मे ही सफल न हो । नीट ,एसएससी, रेलवे आदि की परीक्षा मे जो हुआ और जो हो रहा है हम आप सभी परिचित है । आप सब जान ही रहे है। मैं यहां किसी को सही या गलत नही बता रही बस सोच रही आने वाली हमारी पीढ़ी के कैरियर के विषय मे । कठिनाई तो जीवन के साथ ही जन्म लेती है।
हमारे पास स्नातक करने के बाद दो ही रास्ते होते है खासकर मिडल क्लास के पास - या तो प्राइवेट कंपनी मे जॉब या तो सरकारी की तैयारी । हा ये ठीक है कि कुछ दोनो करने का लक्ष्य रखते है । नौकरी करना ही जरुरतों को पूरा करता है , पर नौकरी मिलना सरल नही ।
जिस तरह प्राइवेट कंपनी मे कठिनाइयो से नौकरी मिलती है उसी तरह सरकारी नौकरी के घोटाले भी न केवल आजकल के युवाओं और विद्यार्थियो का समय और पैसा बर्बाद करते है बल्की उनका मनोबल भी टूट जाता है नौकरी खोजने की चुनौतिया हर किसी युवा को होती है चाहे वो सामान्य हो या विकलांग। सामान्य व्यक्ति के लिये प्रतियोगिता बहुत ज्यादा है । एक पद के लिए 1000 आवेदन आ रहे है जिससे चयन की संभावना कम हो जाती है ।
चलिए ये तो रही आम बात जिससे आप सब अवगत हो पर दिव्यांगों की बात कभी सोची है आपने? उन्हे भी नौकरी की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी सामान्य को । वह अपनी सारी नॉलेज और हिम्मत जुटा के जब 1000 अपने से अलग के बीच साक्षात्कार के लिये जाता है तो उसे सॉरी कहके हटा देते है । उसके लिये तो प्रतियोगिता प्रारंभ होने से पहले ही खत्म ! अगर वह डेफ या हार्ड आफ हियरिंग है तो ये बात और कठिन हो जाती है । फिर भी क्या आपको नही लगता कि उसे एक मौका मिलना चाहिए अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए? अगर कोई त्रुटि है उसमे तो आपको उसकी सहायता करनी चाहिए ,मनोबल बढ़ना चाहिए न की सॉरी कह के हटा देना चाहिए ।
मेरे ख्याल से हर कंपनी को सुलभता अनुकूल होना चाहिए जोकि वर्तमान मे 100 मे 10 ही है इस तरह की कठिनाइयो को मेरे विचार से सरकारी परिक्षाओं मे परदर्शिता के साथ सख्त निगरानी रखनी चाहिए।
प्राइवेट और सरकारी में बराबर की ऑपर्च्युनिटी होना चाहिए। विकलांगों के लिये वेलकमिंग सोसायटी और एक्सेसिबल वर्कप्लेस होना चाहिए साथ ही साथ वर्कप्लेस भी परिवारिक माहौल और तनाव रहित माहौल होना चाहिए।
कैरियर बैरियर तोड़ने के लिए सिर्फ व्यक्तिगत मेहनत नही बल्की सिस्टम और सोसायटी दोनो का सहयोग जरूरी है । जब ऑपर्च्युनिटी बराबर होगी , तभी हर युवा , सामान्य हो या विकलांग अपनी प्रतिभा के दम पर प्राइवेट और सरकारी सेक्टर मे सफलता हासिल करेगा ।
अगर आप भी किसी कंपनी या किसी आर्गेनाइजेशन से है या कोई है जो मेरी बात से इत्तेफाक रखते है अपने विचार हमे खुलकर साझा कीजिए ।
लेखक :- सृष्टि दुबे प्रयागराज

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