आइए पढ़ते हैं राही की रचना आत्म पहचान



रुक जाना हमेशा कुछ कहने से पहले, 

संभल जाना जरा आगे बढ़ने से पहले, 

बन जाना दुनिया की तुम भले ही बाद में, 

अपना बन जाना किसी और का बन जाने से पहले,

रुक जाना जरा, कुछ कहने से पहले..... 1

 समझ कर रात को जो तुम दिन में सो रहे हो,

 खूबसूरत से जिंदगी को ऐसे ही खो रहे हो,

 कहीं खत्म ना हो जाए जिंदगी शुरू होने से पहले,

 उठो मेरे बाबू रात होने से पहले,

 रुक जाना हमेशा कुछ कहने से पहले..... 2

 अपनों में ही जो तू उलझा हुआ है, 

जलता हुआ दीपक जो तेरा बुझा  हुआ है,

 खुद को जो तू पहचान लेगा, सारी समस्याएं सुलझा हुआ है.

 सुलझा ले तो खुद को उलझने से पहले,

मिलेगी मंजिल गुम होने से पहले,

 डरेगा यूं ही अगर हमेशा तू, मरेगा तू कई बार मरने से पहले.

 रुक जाना जरा, कुछ कहने से पहले......3

  खुद का सिकंदर है तू,हारेगा

 कैसे,

 शाश्वत है तू, तुझे कोई मारेगा कैसे

थका है तू, टुटा नहीं है, कोई तुझे ललकारेगा कैसे

 जीता है तू इस जमीन आसमान को, 

फिर बता तू खुद से हारेगा कैसे.

 समेट लो खुद को बिखरने से पहले, 

संभल जा तू फिर से गिरने से पहले.

 सारा जहां देगा उदाहरण तुम्हारा, 

बस खुद को बना ले बिगड़ने से पहले.

 रुक जाना जरा कुछ कहने से पहले.....4


 रचना:- शरद श्रीवास्तव 

"राही "

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