एकाकी परिवार, खत्म होते रिश्ते - सुबाश चंद्र पाण्डेय


कभी घरों में शोर होता था—बच्चों की हँसी, दादी की कहानी, पिता की डाँट और माँ का स्नेह। अब वही घर खामोश हैं। चार कमरे, चार दीवारें और बीच में बैठा एक अकेला इंसान। यही है आधुनिक जीवन का ‘सफल’ परिवार—जहाँ सब कुछ है, बस साथ नहीं।


संयुक्त परिवार कभी भारतीय संस्कृति की आत्मा थे। एक छत के नीचे पीढ़ियां रहती थीं, झगड़े भी होते थे, पर अपनापन बरकरार रहता था। अब परिवार छोटा नहीं, भावनाएं छोटी हो गई हैं। रिश्ते अब ‘इमोशन’ नहीं, ‘ऑप्शन’ बन गए हैं। एक क्लिक पर दोस्ती, एक ब्लॉक पर रिश्ते खत्म।


शहरों की चमक ने गाँव की मिट्टी की गंध सोख ली है। रिश्ते अब कैलेंडर की तारीखों में सिमट गए हैं—मदर्स डे, फादर्स डे, ग्रैंडपेरेंट्स डे। दिन मनते हैं, लेकिन संबंध मरते जा रहे हैं। घरों में संवाद की जगह स्क्रीन ने ले ली है; अब नज़रों में नहीं, नोटिफिकेशन में मुलाकात होती है।

बुजुर्गों के अनुभव अब “पुराने विचार” कहलाते हैं, और बच्चों का अकेलापन “मॉडर्न लाइफस्टाइल”। कभी जो परिवार संस्कारों की प्रयोगशाला हुआ करता था, अब वह सुविधाओं की प्रदर्शनी बन गया है। बाहर से चमकदार, भीतर से खाली।

एकाकीपन अब किसी कोने की उदासी नहीं, पूरी पीढ़ी की पहच आ गया है कि हम फिर से उन जड़ों तक लौटें, जहाँ ‘हम’ का अर्थ केवल परिवार नहीं, अपनापन था।

थोड़ा वक्त अपनों के लिए निकालें। संवाद करें, साझा करें, सुने और सुने जाएँ।

क्योंकि जब घर रिश्तों से नहीं, लोगों से बसते हैं — तभी जीवन का अर्थ बचता है।


सुबाश चंद्र पाण्डेय 

प्रधान सम्पादक की कहानी, पिता की डाँट और माँ का स्नेह। अब वही घर खामोश हैं। चार कमरे, चार दीवारें और बीच में बैठा एक अकेला इंसान। यही है आधुनिक जीवन का ‘सफल’ परिवार—जहाँ सब कुछ है, बस साथ नहीं।


संयुक्त परिवार कभी भारतीय संस्कृति की आत्मा थे। एक छत के नीचे पीढ़ियाँ रहती थीं, झगड़े भी होते थे, पर अपनापन बरकरार रहता था। अब परिवार छोटा नहीं, भावनाएँ छोटी हो गई हैं। रिश्ते अब ‘इमोशन’ नहीं, ‘ऑप्शन’ बन गए हैं। एक क्लिक पर दोस्ती, एक ब्लॉक पर रिश्ते खत्म।


शहरों की चमक ने गाँव की मिट्टी की गंध सोख ली है। वहाँ रिश्ते अब कैलेंडर की तारीख़ों में सिमट गए हैं—मदर्स डे, फादर्स डे, ग्रैंडपेरेंट्स डे। दिन मनते हैं, लेकिन संबंध मरते जा रहे हैं। घरों में संवाद की जगह स्क्रीन ने ले ली है; अब नज़रों में नहीं, नोटिफ़िकेशन में मुलाकात होती है।


बुजुर्गों के अनुभव अब “पुराने विचार” कहलाते हैं, और बच्चों का अकेलापन “मॉडर्न लाइफस्टाइल”।

कभी जो परिवार संस्कारों की प्रयोगशाला हुआ करता था, अब वह सुविधाओं की प्रदर्शनी बन गया है। बाहर से चमकदार, भीतर से खाली।


एकाकीपन अब किसी कोने की उदासी नहीं, पूरी पीढ़ी की पहचान बनता जा रहा है। अवसाद, तनाव, आत्मकेंद्रितता—ये उसी खोखले जीवन की संतानें हैं, जहाँ रिश्तों की जड़ें सूख गई हैं।


समय आ गया है कि हम फिर से उन जड़ों तक लौटें, जहाँ ‘हम’ का अर्थ केवल परिवार नहीं, अपनापन था।

थोड़ा वक्त अपनों के लिए निकालें। संवाद करें, साझा करें, सुने और सुने जाएँ।

क्योंकि जब घर रिश्तों से नहीं, लोगों से बसते हैं — तभी जीवन का अर्थ बचता है।


सुबाश चंद्र पाण्डेय 

प्रधान सम्पादक

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