राही की कलम से -- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेषांक

  


काली घटा थी छा रही,

 विकराल रूप थी ला रही,

 धरती को जलमग्न बनाने को,

 अस्तित्व धरा का मिटाने को,

 मौत का मंजर छा रहा,

इंद्र अतिवृष्टि करा रहा,

 दामिनी पल पल चमक रही है काली घटा भी गरज रही है,

 इस विकराल दामिनी बीच में मौत मानो झांक रहा, 

 प्रकृति के भयंकर रूप को देखकर,हर कोई थर-थर कांप रहा.......

 धरती को प्रलय से बचाने को इस मृत्यु सैया से हटाने को,

 इंद्र को सबक सिखाने को,

 धर्म का पाठ पढ़ाने को,

 गोकुल को फिर से बचाने को,

कंस को घुटने पर लाने को,

 मधुसूदन ही अवतार लिया,

लाखो का जीवन तार दिया......

 सलाखों के दरवाजे टूट गए सैनिकों के पसीने छूट गए,

 पाप धर्म पर चलने वालों की मानो किस्मत रूठ कर गए,

 यमुना का घमंड था बढ़ रहा,

 इन्द्र का पारा भी चढ़ रहा,

 कृष्ण को डुबाने को

 यमुना हर प्रयास कर रहा,

 न जाने कितने जीवो को उसने पल में मार लिया,मुरली वाले के पैरों को छूकर उसने खुद को तार लिया,

 घमंड  इंद्र का टूट गया, मानो जमुना भी शर्मा गई,

 कंस की मौत की खबर सुनने अंबाजी  कन्या रूप थी आ गई,

दरवाजे सारे बंद हुए,

सारे रक्षक थे जाग गए,

जैसे ही वासुदेव लौटे वहां से,

 मानो कंस की किस्मत भाग गए,

 देवकी के आठवां लाल हुआ कंस का जो काल हुआ,

 खबर पहुंची थी कंस तक 

जो होना था तत्काल हुआ..

 आठवां पुत्र कंस तक लाया गया,

 गोदी में उसको उठाया गया,

 यह होगी मेरी मौत ऐसा कहा था किसी ने,

ऐसा कहकर उसका मजाक उड़ाया गया..

 कंस जैसे ही उसे फेंकना चाहा असली रूप उसने अपना लाया,

 रे मूर्ख तो यह क्या कर रहा

 तेरा मौत कहीं तो और पाल रहा,

 इस धरती को पाप से बचाने को तेरा अस्तित्व मिटने को,

 देवकी का लाल है आ चूका,

 तेरा मौत तो अब छा चूका,

 स्वयं काल भी तुझे ना बचा सकेगा,

 तेरी मौत  कोई भी ना अब डाल सकेगा,

 यह तो तेरे लिए अच्छा है,

 तेरा कातिल तेरी बहन का बच्चा है,

 धरती को बचाया जाएगा,अब तू तो मारा जाएगा.......


रचना - शरद श्रीवास्तव राही

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